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रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-1)
कहां से शुरू करूं?
सन् उन्नीस सौ साठ में मैंने हायर सेकेण्डरी, तब ग्यारहवीं, की परीक्षा पास की थी, प्रथम श्रेणी में। हिन्दी, संस्कृत, सामाजिक अध्ययन और आंतरिक मूल्यांक ने सहारा दिया अन्यथा रसायन शास्त्र और भौतिकशास्त्र ने तो मेरी नैया डुबो ही दी थी।
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रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-2)
दो दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी की अंधियारी सुबह लगभग चार बजे मुझे एक चुड़ैल की कहानी याद क्यों आ गई? लगभग तीस सालों बाद स्मृति पटल पर एक प्रेतकथा के कौंधने का क्या औचित्य था? आगे..
रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-3)
दो दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी की रात बीत चुकी थी और अंग्रेजी कैलेंडर के आधार पर तीन दिसम्बर की तारीख की शुरुआत थी। रात्रि का बारह बज चुका था। आगे..
रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-4)
'अभी मैं अपनी मां, बहन व बेटे को शहर के बाहर वीराने में छोड़ कर आ रहा हूं और अब पत्नी व छोटे भाई को लेने जा रहा हूं। पता नहीं कि वे अब तक जीवित भी होंगे या नहीं।' वह आदमी रो पड़ा। मक्खन और चिलम स्कूटर के सामने से हट गए और हमारे पास आ गए। आगे..
रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-5)
तीन दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी। मैं अशोका होटल में हूं। सुबह का उजियारा पूरे शहर में फैल चुका है लेकिन हर चेहरे पर स्याहपन है। सब यह जान चुके हैं कि बीती रात यूनियन कार्बाइड नामक कारखाने से कोई जहरीली गैस रिसी थी जिसने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया है और हजारों मौत से जूझ रहे हैं। आगे..
रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-6)
सच, कितनी कड़ी परीक्षा से गुजरे थे हम और भोपाल के लाखों नागरिक दो-तीन दिसम्बर उन्नीस सौ चौरासी की रात को। आगे..
रात और मौत के आगे-आगे (उपन्यास-7)
चार तारीख की सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के आसपास बस हीरागंज स्थित बजरंगा के घर के सामने पहुंची। सैकड़ों लोग बारात की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। बारातियों के रिश्तेदार, परिचित, यार दोस्त।  आगे..
शगल
उसने पूरी संजीदगी के साथ कहा था- मैं किस्सा नहीं बल्कि एक विचार हूं। मुझे रंग रोगन देकर जगजाहिर मत करना। आगे..
शगल-2
... नहीं हैं... मैंने कहा- मैं यहां अकेला ही रहता हूं।
-तब तो और भी ज्यादा जरूरत है मेरी। झाड़ू पोंछा और बर्तन तो कर दूंगी। आप कहें तो खाना वगैरह भी बना दिया करूं। पूरा काम करने के हजार रुपए महीना और खाना नहीं बनवाना हो तो पांच सौ रुपए।
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शगल-3
वह बोल रही थी और मैं सुन रहा था। जैसे कोई फिल्म चल रही हो। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आभिजात्य संस्कार वाली लड़की का यह उसका अभिनय है अथवा वह झाड़ू-पोंछा वाला अभिनय था। जो भी, दोनों रूपों में वह मुझे परिपूर्ण लगी।  आगे..

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