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कविता-यातना के सफर
कविता-
यातनाओं का
अंतहीन सफर होती है
जब जुड़ते हैं-
ईमानदारी से।
 आगे..
दोहों में दिनमान
उजले धन के हो गए काले कारोबार।
ऊपर की ही आय अब अर्जन का आधार।।
 आगे..
कविता?
कविताएं
कागजों पर नहीं लिखी जातीं,
पढ़ी नहीं जाती मुंह से
सुनी नहीं जातीं कानों से
देखी नहीं जातीं आंखों से
 आगे..
दिवंगत पिता के जूते
जूते हैं ये
दिवंगत-पिता के
जिन्दा-सबूत
 आगे..
गांधारी-घोष
लो!
मैंने बांध लीं / स्याह-पट्टियां /
आँखों से / कसकर / सदैव के लिए
 आगे..
समुद्र
अभी कुछी देर पहले पनडुब्बियां विशाल
गुजरी थीं बिलकुल यहीं से अकस्मात
यहीं से गुजरे थे सेना को ले जाते हुए जहाजा भव्य
 आगे..
एक मामूली आदमी
न मालूम कहाँ से
जुटा रखता है सम्बल
तमाम विपरीत हालात में
जिन्दा रह पाता है,
 आगे..
इतिहास जानता है
सड़क
बन रही है
फुटपाथ टूट रहा है
 आगे..
हाय...मेहनत हुई...भिखारी!
तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन
जूठन में डाले हैं !!
भरे पेट इतराते इतने
बुरी आदतों के पाले हैं!!
 आगे..
तैराते हो मछली मिनरल वाटर में
कितनों की आरती उतारी बाबू जी!
शोभा बरनि न जाय तुम्हारी बाबू जी!
 आगे..

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