उपसंहार: लोकप्रिय और लोकमान्य
इसका पता वृहत्तर भारतीय समाज को पता ही नहींचला। पाश्चात्य और प्राच्य की दो नावों पर पैर रखते-रखते अब हम पूरी तरह भटक चुके हैं। बचा है तो सिर्फ अतिरेक, जिसमें या तो संस्कृति के नाम पर कट्टरता थोपी जा रही है या खुलेपन के नाम पर अश्लीलता। दृश्य माध्यम, विशेषकर आज के प्रचलित धारावाहिकों और तथाकथित रियलिटी शो में जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है, उसमें शालीनता को ताक पर रखकर टीआरपी बढ़ाने का प्रचलन हो गया है। जो जितनी फूहड़ता दिखला सकता है, वो उतना लोकप्रिय होगा। कसौटी अब लोकमान्य होने की नहींहै, लोकप्रिय होने की है। बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ, सारा कारोबार इसी तर्ज पर चल रहा है। आगे..
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प्रस्तावना
मनोज कुमार को अपनी जिन फिल्मों के कारण ''भारत कुमार'' की उपाधि मिली उनमें से एक है ''पूरब और पश्चिम''। कोई तीस वर्ष पूर्व बनी इस फिल्म में भारतीय संस्कृति बनाम पश्चिमी संस्कृति का द्वंद्व चित्रित किया गया था। इस फिल्म का जो संदेश था, वही आए दिन साधु-महात्माओं के प्रवचनों, कीर्तनों, कथापाठों में सुनने मिलता है। इनके माध्यम से यह बात जनमानस में बैठा दी गई है कि पश्चिम की संस्कृति पूरी तरह से भोगवादी और इस कारण नकारने योग्य है; जबकि उसके बरक्स भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता ही प्रमुख तत्व है और यह कि हमें सांसारिक विषयों का लोभ-लालच नहीं है। आगे..
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उपसंहार: राष्ट्रमंडल खेल और भारतीय संस्कृति
देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित 19वां राषट्रमंडल खेल कई कारणों से अच्छी और बुरी चर्चा में रहा। आयोजन, तैयारी, बजट का बढ़ते जाना, तरह-तरह के घोटाले, उद्घाटन किसके हाथों होना है, आदि-आदि बातों पर खूब लिखा-पढ़ी, कहा-सुनी हुई और अगले कई दिनों तक होती रहेगी। खेल का उद्घाटन व समापन सत्र अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण विशेष रूप से चर्चा में रहा। इन दो अवसरों को विशिषट रूप देने के लिए आयोजकों ने खूब दिमाग दौड़ाया होगा, कि हम ऐसा क्या करें जिससे दर्शकों का मन मोहा जा सके और दुनिया में इसकी चर्चा भी खूब हो, इसके साथ उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत की बहुविध संस्कृति को एक कार्यक्रम में समेटने की भी थी। आगे..
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प्रस्तावना
पाठकों की दो पीढिय़ां गुजर जाएं; और फिर एक दिन अचानक मालूम हो कि उस लेखक की नई, एकदम नई पुस्तक बिना किसी शोर-शराबे के प्रकाशित हो गई है तो उन लोगों का मुदित-आनंदित होना स्वाभाविक है, जो लेखक को लम्बे समय से जानते हों, अथवा उसकी पुरानी रचनाओं के प्रशंसक रहे हों।
ऐसी अघट घटना इसी साल हुई। रचनाकार का नाम है- प्रबोध कुमार। अपने समय की लगभग हर प्रतिष्ठित पत्रिका में उनकी कहानियां प्रकाशित होती थीं।
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उपसंहार: शबाना नगर गली नंबर 60
मशहूर फिल्म अभिनेत्री व सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने हाल ही में अपने जीवन के 60 बसंत पूरे किए। सिनेमा व थियेटर में अभिनय से लकर सामाजिक जीवन में उनकी सक्रियता व सकारात्मक भूमिका देखकर यह लगता ही नहींकि वे उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं, जहां लोग सेवानिवृत्ति की बात सोचने लगते हैं। अभी अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के एक दिन पहले उन्होंने भारत में बालिकाओं की स्थिति पर रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम में भाग लिया। हाल ही में दिल्ली में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर एक नाट्य प्रस्तुति भी दी। वे महिला सशक्तीकरण की बात करती हैं, कभी एड्स के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाती हैं, कभी साक्षरता की बात करती हैं तो कभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की। आगे..
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प्रस्तावना
जब कभी भी साहित्य पर चर्चा होती है, वह अक्सर कविता, कहानी अथवा उपन्यास तक सिमटकर रह जाती है। जीवनी और यात्रा वृत्तांत को हाल के वर्षों में मान्यता मिलने लगी है, लेकिन डायरी और पत्र विधा की अभी भी लगभग अनदेखी हो रही है। इस स्थिति को तोडऩे के प्रयत्न इधर कुछ लेखकों ने किए हैं। नामी-गिरामी लेखकों की डायरियों के अंश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं, यद्यपि इनमें एक बनावटीपन है जो साफ नजर आ जाता है। इस वजह से उन पर गंभीरतापूर्वक चर्चा करने की आवश्यकता है। डायरी और पत्र- दोनों पाठक को लेखक के निजी संसार में ले जाने का सीधा रास्ता बनाते हैं। यूं तो कविता हो या कहानी, उनमें भी लेखक अपना निजी संसार ही रचता है, लेकिन उसे पहचानना औसत पाठक के बस की बात नहीं होती। आगे..
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प्रस्तावना
कोई कहानी सैय्यद हैदर राज की बनाई तस्वीर की मानिंद हो सकती है कि आप सूरज की टिकुली को नार साध कर देखते हुए अनुमान लगाते रहें कि लाल या काला बिन्दु जगत का कौन-सा भेद आपके सामने प्रकट कर रहा है! कोई कहानी जगदीश स्वामीनाथन के बनाए चित्र की तरह भी हो सकती है कि शून्य में टिकी एक पत्ती से आप पूछें कि जीवन का कौन-सा रहस्य उसने अपनी काया में सहेज रखा है! ऐसी कहानी कभी शायद मणि कौल या कुमार शाहनी की बनाई किसी फिल्म का आभास कराए कि अतिमंथर गति से आगे बढ़ती फ्रेम से आप सत्य का कोई रेशा खींचकर निकाल लें। या फिर संभव है कि आपके सामने वह हो जो बरबस मार्क्वो की याद दिला दे- आगे..
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उपसंहार : भोपाल : कठिन संघर्ष का दुखांत
2-3 दिसम्बर 1984 की काली रात को भोपाल में घटित मौत की विनाश लीला ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया था। आज 25 साल बाद जब उस दुर्घटना के जख्म भरने चाहिए, लेकिन उन्हें नए सिरे से कुरेद कर रख दिया गया है। यूनियन कार्बाइड के खिलाफ लगातार संघर्षरत लोग अपनी ही सरकार व प्रशासनिक व्यवस्था से लड़ते-लड़ते थक गए और रही-सही कसर आज आए फैसले ने पूरी कर दी। आगे..
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प्रस्तावना
''सात फेरे'' चन्द्रकिशोर जायसवाल का तीसरा एवं नव्यतम वृहद उपन्यास है। इसके पूर्व उनके दो बड़े उपन्यास क्रमश: ''चिरंजीव'' व ''पलटनिया'' आ चुके हैं। इसके अलावा लेखक के अनेक छोटे उपन्यास व कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। सत्तर वर्षीय श्री जायसवाल की पीढ़ी में शायद ही किसी और ने इतना ज्यादा लिखा हो। यदि यह लेखन परिमाण में बड़ा होता तो उस पर चर्चा करने की बहुत जरूरत नहीं होती। बात सिर्फ ज्यादा लिखने की नहीं है। आगे..
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उपसंहार : आरटीई की ऐतिहासिकता
भारत में परंपरा है किप्रधानमंत्री 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं। 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि को जब प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया था तो भारत की भावी तस्वीर कैसी हो, इसका उल्लेख किया था। उनके प्रधानमंत्री रहते यह संबोधन जनता पर प्रभाव डालता रहा, क्योंकि वह दिल की गहराइयों से निकलता था। बाद में इंदिरा गांधी तक यह प्रभाव कुछ हद तकबना रहा। लेकिन इसके बाद सरकारी सूचनाओं का ब्यौरा भर रह जाने के कारण प्रधानमंत्रियों के संबोधन लोगों को अपील ही नहींकर पाए। गुरुवार 1 अप्रैल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का राष्ट्र के नाम संबोधन प्रभावहीन श्रेणी में रखा जा सकता है। आगे..
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