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कोई कहानी सैय्यद हैदर राज की बनाई तस्वीर की मानिंद हो सकती है कि आप सूरज की टिकुली को नार साध कर देखते हुए अनुमान लगाते रहें कि लाल या काला बिन्दु जगत का कौन-सा भेद आपके सामने प्रकट कर रहा है! कोई कहानी जगदीश स्वामीनाथन के बनाए चित्र की तरह भी हो सकती है कि शून्य में टिकी एक पत्ती से आप पूछें कि जीवन का कौन-सा रहस्य उसने अपनी काया में सहेज रखा है! ऐसी कहानी कभी शायद मणि कौल या कुमार शाहनी की बनाई किसी फिल्म का आभास कराए कि अतिमंथर गति से आगे बढ़ती फ्रेम से आप सत्य का कोई रेशा खींचकर निकाल लें। या फिर संभव है कि आपके सामने वह हो जो बरबस मार्क्वो की याद दिला दे-   आगे..
उपसंहार : भोपाल : कठिन संघर्ष का दुखांत
2-3 दिसम्बर 1984 की काली रात को भोपाल में घटित मौत की विनाश लीला ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया था। आज 25 साल बाद जब उस दुर्घटना के जख्म भरने चाहिए, लेकिन उन्हें नए सिरे से कुरेद कर रख दिया गया है। यूनियन कार्बाइड के खिलाफ लगातार संघर्षरत लोग अपनी ही सरकार व प्रशासनिक व्यवस्था से लड़ते-लड़ते थक गए और रही-सही कसर आज आए फैसले ने पूरी कर दी।  आगे..
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''सात फेरे'' चन्द्रकिशोर जायसवाल का तीसरा एवं नव्यतम वृहद उपन्यास है। इसके पूर्व उनके दो बड़े उपन्यास क्रमश: ''चिरंजीव'' व ''पलटनिया'' आ चुके हैं। इसके अलावा लेखक के अनेक छोटे उपन्यास व कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। सत्तर वर्षीय श्री जायसवाल की पीढ़ी में शायद ही किसी और ने इतना ज्यादा लिखा हो। यदि यह लेखन परिमाण में बड़ा होता तो उस पर चर्चा करने की बहुत जरूरत नहीं होती। बात सिर्फ ज्यादा लिखने की नहीं है।   आगे..
उपसंहार : आरटीई की ऐतिहासिकता
भारत में परंपरा है किप्रधानमंत्री 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं। 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि को जब प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया था तो भारत की भावी तस्वीर कैसी हो, इसका उल्लेख किया था। उनके प्रधानमंत्री रहते यह संबोधन जनता पर प्रभाव डालता रहा, क्योंकि वह दिल की गहराइयों से निकलता था। बाद में इंदिरा गांधी तक यह प्रभाव कुछ हद तकबना रहा। लेकिन इसके बाद सरकारी सूचनाओं का ब्यौरा भर रह जाने के कारण प्रधानमंत्रियों के संबोधन लोगों को अपील ही नहींकर पाए। गुरुवार 1 अप्रैल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का राष्ट्र के नाम संबोधन प्रभावहीन श्रेणी में रखा जा सकता है।  आगे..
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ऐसा कुछ संयोग बना कि पिछले कुछ दिनों में अपने तीन प्रिय लेखकों की जीवनी विधा में लिखी तीन पुस्तकें एक के बाद एक पढ़ गया। ये हैं- हृदयेश की आत्मकथा ''जोखिम'', अजित कुमार द्वारा लिखी जीवनी ''कविवर बच्चन के साथ'' और ममता कालिया का उपन्यास ''दुक्खम-सुक्खम''। जब पुस्तकें पढ़ ली तो उन पर कुछ लिखने का भी मन हो आया। यद्यपि इन्हें मैंने सामान्य पाठक की हैसियत से ही पढ़ा है। ''दुक्खम-सुक्खम'' को उपन्यास कहा गया है लेकिन यह लगभग पूरी तरह से आत्मकथात्मक रचना ही है। यह कोई अनोखी बात नहीं है। ऐसे अनेक उपन्यास हैं जिनमें लेखक रचना के भीतर निरंतर अपनी उपस्थिति दर्ज करते चलता है। ममता कालिया का यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर लिखा गया है। जैसा कि ब्लर्ब में ही कहा गया है- ''उपन्यास में बीसवीं सदी की बदलती हुई मथुरा है।'' और यह भी कि इस आख्यान में तीन पीढ़ियों की सहभागिता है। लेखिका की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने मात्र पौने तीन सौ पृष्ठों में लगभग एक शताब्दी की उथल-पुथल को समेटने का प्रयत्न किया है और इसमें वे काफी हद तक सफल रही हैं।   आगे..
उपसंहार : महारैली से उपजी महाबेचैनी
दलित की बारात दबंगों ने निकलने नहींदी या नोटों की माला पहनने पर दलित दूल्हे की पिटाई जैसी खबरों को जो लोग उदासीन भाव से देख-सुन जाते हैं, उन्हें इस बात से बड़ी बेचैनी हो रही है कि वर्तमान में दलितों की सबसे बड़ी नेता मायावती ने हजार-हजार के करारे नोटों की विशालकाय माला कैसे पहन ली। आगे..
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अप्रतिम कलाकार मकबूल फिदा हुसैन एक बार फिर सुर्खियों में हैं। सबसे पहले 'द हिन्दू' ने 26 फरवरी को खबर छापी कि श्री हुसैन ने खाड़ी के मुल्क कतर की नागरिकता ग्रहण कर ली है। इसके साथ उनका एक हस्तलिखित नोट भी छपा कि ''मैं मकबूल फिदा हुसैन भारतीय मूल का कलाकार कतर की नागरिकता ले रहा हूं।'' स्वाभाविक है इसके बाद पूरे देश में इसे लेकर हल्ला मच गया। एक तरफ सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी निशाने पर आई तो दूसरी तरफ संघ परिवार भी। प्रबुध्दजनों ने सरकार से जानना चाहा कि क्या यही देश का सर्वधर्म निरपेक्ष संविधान है कि पंचानबे वर्ष की आयु में हुसैन साहब को निर्वासित जीवन व्यतीत करते हुए एक पराए देश में नागरिकता लेने मजबूर होना पड़े। संघ परिवार के बारे में भी कहा गया कि उसका जो उग्र हिन्दूवाद तथा अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णुता है उसके चलते आज यह नौबत आई है।   आगे..
तस्लीमा और हुसैन
एम.एफ. हुसैन और तस्लीमा नसरीन दो ऐसे नाम हैं, जो अपनी अभिव्यक्तियों के कारण लंबे समय से विवादों में हैं। जब-जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विमर्श होगा, इनके प्रसंगों को उध्दृत जरूर किया जाएगा। एम.एफ. हुसैन हिन्दू कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं तो तस्लीमा नसरीन मुस्लिम कट्टरपंथियों के। राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल की तरह हुसैन पूरे भारत में लोकप्रिय चित्रकार थे और अब भी बहुसंख्यक लोगों के लिए हैं। उनकी बनाई एक-एक तस्वीर लाखों में बिके, तो उसके पीछे कुछ बात होगी ही। लेकिन 90 के दशक में 70 के दशक में बनाई गई उनकी कुछ तस्वीरों पर अनायास विवाद शुरू हो गया।  आगे..
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यद्यपि हिन्दी में छपी पुस्तकों की बिक्री कम होती है, लेकिन इससे लेखक या प्रकाशक के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। रचनाकार निरंतर अपनी कलम चला रहे हैं और प्रकाशक बराबर पुस्तकें छापे जा रहे हैं। मेरा अनुमान है कि हिन्दी में कम से कम पांच हजार पुस्तकें प्रतिवर्ष प्रकाशित होती हैं। शासकीय पुस्तक खरीदी के लिए गठित समितियों की बैठकों में मुझे दो-तीन बार भाग लेने का मौका मिला है तथा वहां मैंने पाया कि नई-पुरानी मिलाकर प्रतिवर्ष औसतन सात हजार पुस्तकें खरीदी के लिए प्रस्तुत की जाती है।   आगे..
उपसंहार : ज्योति बाबू का जाना
भारतीय राजनीति के पुरोधा ज्योति बसु का निधन इस देश के लिए अपूरणीय क्षति है। सिर्फ इसलिए नहींकि वे उन चंद राजनीतिज्ञों में एक थे, जिन्होंने आजादी के पहले की भारतीय राजनीति को करीब से देखा-समझा था, वे वरिष्ठतम राजनीतिज्ञों में से एक थे, बल्कि इसलिए भी भारतीय राजनीति में उनके जैसी मिसाल दुर्लभ है। उनसे सीखने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी था। मसलन यह कि राजनैतिक और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, शुचिता और इन सबसे बढ़कर अनुशासन के क्या मायने हैं।  आगे..

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