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एक जरूरी किताब
'विराम चिन्ह क्यों और कैसे?' भला यह भी कोई विषय है जिस पर कोई पुस्तक लिखी जा सके? शायद यही सोचकर अभी तक किसी लेखक द्वारा इस विषय पर कोई पुस्तक लिखना तो दूर, किसी पत्र-पत्रिका में कोई लेख भी मेरे देखने में अभी तक नहीं आया है। पर महेन्द्र राजा जैन की 'विराम चिन्ह' शीर्षक इस पुस्तक में इस विषय पर कितने विस्तार से और ऐसे रोचक ढंग से विचार किया गया है कि लगभग 250 पृष्ठों का यह पुस्तक पढ़ते हुए ऊब नहीं होती।
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'आग के मौसम में' के बहाने
'जहां अवाम लड़े खुद की बेहतरी के लिए / वहां तरसते नहीं लोग रहबरी के लिए' जनतांत्रिक चेतना से सराबोर ये पंक्तियां धनबाद के चिरकुंडा में बसे कवि मिलिन्द काश्यप के काव्य संकलन 'आग के मौसम में' की है, जिसका लोकार्पण प्रगतिशील लेखक संघ के बैनर तले रांची में सम्पन्न हुआ। आगे..
समकालीन सच की कविताएं 'दूर क्षितिज तक'
नरेश दाधीच के पहले काव्य संग्रह 'दूर क्षितिज तक' की पहली कविता 'दूर गगन से आया पंछी' में समकालीन जीवन के सच के रुप में 'भय का साया है आगे..
'नहीं' में है मानवीय जिजीविषा की पक्षधरता
चाहे कविता हो या कथा, किसी भी संकलन का शीर्षक- 'नहीं'- कुछ अटपटा लगेगा कि नहीं?  आगे..
'ऍंधेरे का ताला' उजाले का रास्ता
सुपरिचित लेखिका ममता कालिया का उपन्यास 'अंधेरे का ताला' का नाम ही प्रतीकात्मक है- अंधेरे से उजाले की ओर यूं ही नहीं जाया जाता।  आगे..
स्त्री मन को पढ़ने की कहानियां
ईमानदारी की बात यह है कि मैंने शमोएल अहमद की सारी कहानियां पढ़ी नहीं।  आगे..
संवेदना की जमीन पर जन्म लेती कहानियां
हिन्दी कथा साहित्य दो धाराओं में विकसित होता हुआ दिखाई देता है।  आगे..
निबंधों का परिदृश्य
डॉ. अमलसिंह 'भिक्षुक' का पहला निबंध-संग्रह समकालीन हिन्दी कविता, आलोचना तथा अन्य निबंध एक ऐसी आलोचना- आगे..
'कुछ अंगारे कुछ फुहारे'
गेय छान्दसिकता जहां गीतों और गजलों को जन्म देती है, वहीं गीतों और ंगालों की दिपदियां मुक्तकों को जन्म देती हैं।  आगे..
सिर्फ मौसम का इश्तिहार नहीं रोहिणी का तपना
गांव में रोहिणी का तपना बेहद त्रासद हुआ करता है। इन्हीं दिनों नीम की निम्बोलियां झरा करती हैं  आगे..

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