पौरुष के कवि केदार
जनकवि केदारनाथ अग्रवाल के शताब्दी वर्ष के क्रम में प्रलेस इकाई द्वारा 22 जून 2010 केदार जी की पुण्यतिथि का आयोजन उनके जन्म गांव कमासिन के वासियों के द्वारा किया गया। आगे..
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दीपक श्रीवास्तव को रमाकांत कहानी पुरस्कार
गांधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली में आयोजित 13वें रमाकांत स्मृति कहानी समारोह में लखनऊ से आए कथाकार दीपक श्रीवास्तव को डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. कमला प्रसाद और श्री आनंद प्रकाश ने पुरस्कृत किया। आगे..
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केदारनाथ अग्रवाल विशेषांक
अज्ञेय, नागार्जुन व शमशेर बहादुर सिंह पर आधारित विशेषांकों के बाद केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित विशेषांक आपके हाथों में है। इस विशेषांक और पूर्व प्रकाशित विशेषांकों में भी हमारा प्रयास रहा कि लेखकों के साथ-साथ पाठकों की भागीदारी अधिक से अधिक हो सके। आगे..
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'जनकविता व जनकवि के निर्माण में लोक सहभागी होता है'
2-3 अक्तूबर 2010 को महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. वर्धा में आयोजित संगोष्ठी 'बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ' के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया। आगे..
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'शिवराम क्रांतिधर्मी नाटककार थे'
प्रसिद्ध जननाट्यकार शिवराम के निधन पर एक स्मरणांजलि सभा में विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि शिवराम सचमुच क्रांतिधर्मी नाटककार थे। आगे..
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बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेंच के फैसले पर जलेस प्रलेस और जसम का साझा बयान
रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का फैसला इस देश के हर इंसाफपसंद नागरिक के लिए दुख और चिंता का सबब है। इस फैसले में न सिर्फ तथ्यों, सबूतों और समुचित न्यायिक प्रक्रिया की उपेक्षा हुई है, बल्कि धार्मिक आस्था को अदालती मान्यता देते हुए एक ऐसी नजीर पेश की गई है जो भविष्य के लिए भी बेहद खतरनाक है। इस बात का कोई साक्ष्य न होते हुए भी कि विवादित स्थूल को हिन्दू आबादी बहुत पहले से भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मानती आई है, फैसले में हिन्दुओं की आस्था को एक प्रमुख आधार बनाया गया है। आगे..
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सूती मजदूरों के धागों में गुंथा प्रेम त्रिकोण
न्यू थियेटर्स फिल्म कंपनी अपनी फिल्मों के लिए भारत भर में प्रसिद्ध रहा है। आज भी उसका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है। जब भारत की दूसरी फिल्म कंपनियां स्टंट और पौराणिक फिल्मों में ही उलझी हुई थीं, तब न्यू थियेटर्स ने सामाजिक फिल्में बनाने का बीड़ा उठाया था। आगे..
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