अनास्था पर आस्था का शिलालेख लिखने वाले प्रगतिशील कवि: केदारनाथ अग्रवाल
साहित्य की विधाओं में अगर अस्वीकृति की संस्कृति को त्याग दिया जाय, विद्रोह और आग्रह को त्याग दिया जाय, प्रकाश और अंधकार, शोरगुल और चुप्पी तथा सामीप्य एवं दूरी का विचारण भी त्याग दिया जाए तो फिर साहित्य में बचेगा ही क्या? यह युगीन सत्य है कि साहित्य में ही नहीं जीवन में भी उपर्युक्त विलोम संस्कृति ही जिजीविषा और जीवन संघर्ष को उद्यत करने वाली संस्कृति है। आगे..
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लोकमुख कविताओं का प्रखर कवि : केदारनाथ अग्रवाल
एक अप्रैल 1911 को बांदा में जन्मे प्रगतिशील काव्यधारा के विख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल ने माक्र्सवादी दर्शन को जीवन का आधार मानकर जनसाधारण के जीवन की गहरी व व्यापक संवेदना को अपनी कृतियों में मुखरित किया है। आगे..
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शलाका पुरुष: केदारनाथ
नयी कविता के पुरोधा कवि केदारनाथ अग्रवाल की काव्ययात्रा प्रगतिवादी चिंतन से प्रारंभ हुई है। उनकी कविता विविध आयामी है। वे एक ऐसे कवि हैं जिनकी प्रतिभा प्रज्ञा प्रेम, प्रकृति, प्रगतिवाद एवं परिवेश को स्पर्श करती हुई पाठक को प्रभावित करती है। आगे..
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प्रगतिवादी रचनाकर्मी: केदारनाथ अग्रवाल
हिन्दी कविता की प्रगतिशील वैचारिकता के रुपाकार केदारनाथ अग्रवाल की गणना शीर्षस्थ प्रगतिवादी रचनाधर्मियों में की जाती है। वह बहुआयामी और बहुविध कवि थे। आगे..
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वैभव की विशाल छत्रछाया में
साहित्य जगत के कीर्ति स्तंभ अद्मय जिजीविषा के स्वामी और युवाओं की तरह स्वप्नदर्शी केदारनाथ का व्यक्तित्व उनकी संकल्प शक्ति, गंभीर अध्ययन, सुरुचि, अध्यवसाय और बौद्धिक अनुशासन के जो संस्कार उनके व्यक्तित्व में है वही उनके साहित्य में है जिसके कारण उनकी रचनाएं कालजयी बन गई हैं।
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केदारनाथ अग्रवाल
हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में केदार अपने प्रकृति-प्रेम और अपनी आंचलिक कविताओं के कारण याद किये जाते रहेंगे। केदार ने अपने कवि जीवन का प्रारंभ प्रेम और श्रृगार के रुमानी कवि के रुप में किया था और बीच के संघर्षी स्वर के बाद परवर्ती कविताओं में फिर उनका मानवीय और प्राकृतिक सौंदर्य और प्रेम के कवि का रुप ही अधिक मुखर हुआ है।
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केदारनाथ अग्रवाल (2)
हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में केदार अपने प्रकृति-प्रेम और अपनी आंचलिक कविताओं के कारण याद किये जाते रहेंगे। केदार ने अपने कवि जीवन का प्रारंभ प्रेम और श्रृगार के रुमानी कवि के रुप में किया था और बीच के संघर्षी स्वर के बाद परवर्ती कविताओं में फिर उनका मानवीय और प्राकृतिक सौंदर्य और प्रेम के कवि का रुप ही अधिक मुखर हुआ है।
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केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में प्रकृति प्रेम
प्रारम्भ से ही साहित्य में प्रकृति को अनेक रूपों में चित्रित किया जाता रहा है। प्रकृति के सुकोमल और भयावह रूप, उसके आलंबन तथा उद्दीपन रूप के साथ-साथ शिल्पगत प्रवृत्तियों में भी उसका समावेश किया गया। आगे..
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केदारनाथ अग्रवाल की रचना: दृष्टि
नागार्जुन, केदार और शमशेर की त्रयी ने हिन्दी की प्रगतिशील कविता धारा को जिस मुकाम तक पहुंचाया, उस मुकाम तक पहुंचना आज भी अनेक कवियों के लिये संभव नहीं हो सका है। आगे..
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